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September 24, 2026
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दिग्गजों की जन्मभूमि घनसाली में ‘विकास का अकाल’, चुनावी साल में फिर जागा संगठनों का “जनप्रेम”

दिग्गजों की जन्मभूमि घनसाली में ‘विकास का अकाल’, चुनावी साल में फिर जागा संगठनों का “जनप्रेम”

उत्तराखंड की सत्ता के गलियारों में बड़ा रसूख रखने वाली घनसाली विधानसभा सीट बनने से लेकर आज तक अपनी ही बदहाली पर आंसू बहा रही है। पूर्व शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी, पूर्व कद्दावर मंत्री मातवर सिंह कंडारी और दो-दो बार जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी संभालने वाली सोना सज़वान सहित लगातार दूसरी बार के विधायक शक्तिलाल शाह का गृह क्षेत्र होने के बावजूद घनसाली विकास की दौड़ में मीलों पीछे छूट चुका है। कागजों में तो यहाँ दिग्गजों का जमावड़ा रहा लेकिन धरातल पर जनता के हिस्से केवल वादे, उपेक्षा और बदहाली ही आई।इन सबके बीच आंदोलनों का नाटक और ‘दस साल’ का सन्नाटा भी घनसाली की जनता बखूबी देख रही है
क्षेत्रीय राजनीति के पन्नों को पलटें तो रिकॉर्डतोड़ वोटों से जीते पूर्व विधायक भीमलाल आर्य का कार्यकाल जनता को बुनियादी सहूलियतें देने के बजाय सिर्फ धरनों, और बयानों तक सीमित रहा लिहाजा आज उन्हें अपने कार्यकाल को इतिश्री कर कई मुद्दों पर ज्ञापन का सहारा लेकर राजनीति में बने रहने का मौका मिलता रहता है ,वहीं पिछले एक दशक (दो पंचवर्षीय कार्यकाल) से सत्ता का सुख भोग रहे भाजपा विधायक शक्तिलाल शाह भी घनसाली के लिए कोई ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने में पूरी तरह नाकाम रहे। ‘डबल इंजन’ के दौर में भी शक्तिलाल शाह का दस साल का कार्यकाल क्षेत्र की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में बेअसर ही साबित होता हुआ दिख रहा है लेकिन अपने सौम्य स्वभाव के बलबूते विधायक शक्तिलाल तीसरी बार विधानसभा जाने की बाट जोह रहे हैं

वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सेवाएं, आईसीयू में शिक्षा ढांचा

आज आलम यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर घनसाली की हालत किसी आपदा से कम नहीं है। ताजा स्थिति यह है की अस्पताल खुद बीमार हें भिलंगना ब्लॉक के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक उपकरणों का अकाल है। गर्भवती महिलाओं और आपातकालीन मरीजों को आज भी 100-150 किलोमीटर दूर ऋषिकेश या देहरादून रेफर करने का ‘रेफरल सेंटर’ खेल जारी है।जिसका ख़ामियाज़ा कई प्रसव पीड़िताओं को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा

सूबे में शिक्षामंत्री रहे मंत्री प्रसाद नैथानी के गढ़ में स्कूलों का बुरा हाल जस का तस बना हुआ है पूर्व शिक्षामंत्री का गृह क्षेत्र होने के बाद भी कई सरकारी स्कूल एक या दो शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। कई भवनों की छतें टपक रही हैं, लेकिन बच्चों के भविष्य के जिम्मेदार खामोश हैं।नतीजतन कई स्कूलों में कुछ संगठनों के द्वारा तालाबंदी भी करनी पड़ी

चार साल तक जब जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए भटक रही थी, तब मौन साधे बैठे तमाम सामाजिक संगठन और नए-नवेले राजनीतिक चेहरे अचानक अब कूद फाँद करने लगे हैं। चुनाव नज़दीक आते ही अब पोस्टरबाजी, रैलियाँ और जनता के मुद्दों पर हमदर्दी का स्वांग भी ख़ूब देखने को मिल रहा है आलम यह है की यह संगठन और नेता अचानक जनता के मुद्दों पर सक्रिय हो चले हैं सड़क पर रैली बैठकों के दौर और सोशल मीडिया पर पोस्ट की बाड़ अब आने लगी है
ऐसे में यह यह जनसेवा कम बल्कि केवल वोट बैंक साधने की नग्न राजनीति है। जो संगठन और नेता पिछले चार सालों तक जनता के सुख-दुख में गायब रहे, वे आज अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की रोटियां सेकने घनसाली की सड़कों पर ढोल पीट रहे हैं
नेताओं की आपसी नूराकुश्ती और संगठनों के चुनावी स्टंट के बीच घनसाली की जनता अब ठगा हुआ महसूस करने के बजाय आक्रोशित है। इस बार मुकाबला सिर्फ वादों का नहीं होगा, बल्कि उन दिग्गजों से भी हिसाब मांगा जाएगा जिन्होंने घनसाली को सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने की प्रयोगशाला बनाए रखा। ख़ैर अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी मौसम में जागे ये ‘मौसमी मसीहा’ पार पाते हैं या फिर वही कहानी जारी रहेगी

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