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October 17, 2026
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क्या कभी अपने ही बलबूते पर उठ पाएगा उत्तराखंड क्रांति दल , या सिमट जाएगा इतिहास के पन्नों में ?

  • क्या कभी अपने ही बलबूते पर उठ पाएगा उत्तराखंड क्रांति दल, या इतिहास बनकर रह जाएगी यूकेडी?

जिस जल, जंगल और जमीन के लिए कभी सड़कों पर लाठियां खाई गईं, आज उसी जनता और आंदोलनकारियों की नजरों से यूकेडी (उत्तराखंड क्रांति दल) इतनी दूर क्यों हो गई कि अब पार्षद का चुनाव जीतना भी पहाड़ चढ़ने जैसा लगने लगा है?”
कभी जिस दल के नाम से उत्तर प्रदेश की सत्ता की नींव हिल जाती थी, आज उसी उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) की हालत ऐसी हो चुकी है कि उसे खुद अपनी सियासी नैया पार लगाने के लिए किसी तिनके का सहारा नहीं मिल रहा।
राज्य गठन के 25 से अधिक साल बीत चुके हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस पार्टी ने इस भू-भाग के निर्माण की सबसे बड़ी वैचारिक लड़ाई लड़ी आज वही पार्टी धरातल पर अपने वजूद की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। राज्य बनने के बाद सूबे की सियासत में किंगमेकर या एक मजबूत विकल्प बनने की हैसियत रखने वाली यूकेडी आज धरातल पर हाशिए पर चली गई या धकेल दी गई ये बड़ा सवाल है जिसे समझना भी जरूरी है
आंदोलन के शुरुआती दौर में जब उत्तराखंड का बच्चा-बच्चा राज्य की मांग के लिए सड़कों पर उतरा था तब यूकेडी उस आंदोलन का मुख्य चेहरा हुआ करती थी। लोग दिल से जुड़े थे क्योंकि मुद्दा साफ था— जल जंगल और जमीन की रक्षा।
लेकिन जैसे ही राज्य का सपना सच हुआ यूकेडी के भीतर का पावर गेम शुरू हो गया। शुरुआत में एक-दो मंत्री बने, विधायक जीते, और पार्टी को सत्ता के गलियारों में दखल का मौका मिला।
लेकिन अफसोस! जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के बजाय दल के भीतर कुर्सी की भूख भारी पड़ने लगी।हालात यहाँ तक बिगड़े कि एक दौर वह भी आया जब यूकेडी के मुख्य कार्यालय के भीतर ही कुर्सियां एक-दूसरे पर चल पड़ीं। अंतरकलह और अंतर्द्वंद्व ने पार्टी के उस भरोसे को चकनाचूर कर दिया, जिसे खून-पसीने से सींचा गया था।ऐसे में अंतर्कलह का नतीजा सिर्फ नेताओं की आपसी दूरियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा असर पार्टी के वजूद पर पड़ा वावजूद आपसी फूट और कमजोर संगठन के चलते चुनाव आयोग में पार्टी का चुनावी निशान (कुर्सी) तक जब्त हो गया।जिस ‘कुर्सी’ के लिए नेता आपस में लड़ते रहे आखिरकार वह चुनावी निशान ही जनता और पार्टी से दूर हो गया।
कभी विधायक जिताने वाली इस पार्टी की स्थिति अब यह है कि आज के समय में ग्राम पंचायत या नगर निगम का पार्षद जीतना भी उसके लिए पहाड़ जैसा टास्क बन गया है। राष्ट्रीय दल (BJP और Congress) के दोध्रुवीय राजनीतिक चक्रव्यूह में यूकेडी का क्षेत्रीय स्वर पूरी तरह दब चुका है।
आज उत्तराखंड का युवा और वो मूल निवासी जो कभी यूकेडी के साथ खड़े थे, खुद को ठगा सा महसूस करते हैं। वे सवाल पूछते हैं— क्या यूकेडी का वजूद सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गया है?
यदि यूकेडी को अपनी नैया सचमुच पार लगानी है, तो उसे गुटबाजी की दलदल और सोशल मीडिया के से बाहर निकलकर फिर से उन मूल मुद्दों—जल, जंगल, जमीन और स्थानीय नीति—पर लौटना होगा, जिनकी बुनियाद पर इस राज्य का निर्माण हुआ था। अन्यथा जिस जनता ने कभी इस दल को सिर आँखों पर बिठाया था, वह इसे केवल एक ‘यादगार राजनीतिक चैप्टर’ के रूप में ही याद रखेगी।

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